“रोक ले कोई मुझे...
बह न जाऊं लहरों के साथ..
जल्दी लगा दो पहरा..
तोड़ न दूं मैं कोई किनारा..
जैसे चलती है हवा हर तरफ़..
बदल जाती है तूफ़ान में अक्सर...
बस ऐसे ही कुछ हो रहा है मेरे साथ..
ऐसे मन है बात करता...
जब उमंगें और विश्वास ठहर है जाता..
फ़िर समाज हो या रीति-रिवाज..
धर्म हो या जांत-पांत..
सब है धरा का धरा...
काश! सब हो जायें ऐसे..
तो हो जाये यहीं जन्नत का एहसास..
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