"एक ही हैं बहू और बेटी,
पर फिर क्यों लगती परायी बेटी,
क्यों बचपन से सिखाते उसको यहीं,
क्यों कहते हैं कि ये घर तुम्हारा है नहीं,
जाना है तुमको अपने घर,
जब सुनती यहीं बातें सबसे एक बेटी,
तो दूसरे घर में भी वो रहती परायी,
न हो पाती वो अपने घर की,
और न ही वो बन पाती दूसरे घर की,,
इसी असमंजस में उसकी जिंदगी निकल जाती,
पर कौन सा है उसका घर,
ये कभी नहीं समझ पाती😢
बहू को बेटी मानने वाले तो हैं बहुत,
पर बेटी की तरह ही अपनाने वाले नहीं हैं,
बेटी से तो नहीं छुआते किसी के पैर,
पर बहू बनकर ही पैर छुआई बन जाती है रस्म😢
बेटी से तो नहीं होता कोई पर्दा,
पर बहू सर ढककर चले,
यहीं बन जाती है परम्परा,
कहाँ है वो बहू में बेटी😢
कहने में है बहुत आसान,
पर वास्तव में कोई एक भी करके दिखा दे,
यहीं है मेरा अरमान,☺
काश! वो दिन जल्दी आये,
जब मण्डप से ही बहू नहीं,
बल्कि बेटी घर लायें,
दिल से लगाकर रखें,
सबके पैर छुआने में न लगा दें,
सबसे दिल खोलकर कहें कि ये बेटी है,
इसलिये किसी के पैर नहीं छुएगी☺
काश! वो दिन जल्दी ही आये!"
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