शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

स्त्री

कोई स्त्री रिश्तों को निभाने में सहती है 
बहुत कुछ..............मुश्किलें 
उसका दिमाग ,दिल और रूह तक किसी का निष्ठापूर्वक 
साथ निभाने को झेलता है इतने आघात और झटके 
कि दूसरा आदमी आता ही नहीं उसके दिल -ओं -दिमाग में 
वह आदमियो की  तरह तुनक कर झगडती भी नहीं 
कि सब्जी में नमक कम क्यों है 
बल्कि उलटे कहती है .........कोई बात नहीं ,
और मर्द है कि सबसे ज्यादा 
इसी एक बात से खींझते आगबबूला होते है 
बातचीत ऐसे ही टलती जाती है ...............
कभी मैच ख़त्म होने तक .........नहीं तो फिर डिनर या 
दूसरी गैरजरुरी बातो के बहाने |

स्त्रियाँ जिद्दी और बावली होती है अपने प्रेम को ऐसे सीने से चिपका के रहती है ा 
जैसे जीवन न हुआ 
खूंटी के ऊपर टिका हुआ कोई सामान हुआ 
यही वजह है कि वे चाहती है सुकून से बातचीत करे 
और साझा करे अपना दुःख -दर्द 
तब तक आस नहीं छोडती ,जब तक की बंदे को समझा न ले 
और उसके पास बचे न कोई और रास्ता तो
स्त्रियाँ देख ही लेती है कही दूर कोई उजाला 
और खोल डालती है अपनी व्यथा का पिटारा 
पर यह सब करके उनको जवाब क्या मिलता है ?
''अपनी यह बकवास अब बंद भी करो ''
ये सब बाते उसको नाहक की चीख -चीख सी लगती है 
और आदमी उनकी और कभी गौर से देखता तक नहीं 
और इस तरह एक समस्या के समाधान के बगैर 
देखने लगता है दूसरी और 
आदमी को कभी एहसास ही नहीं होता 
कि ये समस्या गोली की तरह सामने आएगी 
और लगेगी उसके सीने पर एक दिन | 

आदमी की नजर में यदि स्त्री करती कोई गिले -शिकवे 
या बार -बार दुहराती रहती है एक ही बात 
आदमी को समझ जाना चाहिए कि 
उसकी आस अभी टूटी नहीं है
और रिश्ता उसके लिए बेशकीमती है 
वो इन सब के बावजूद उसे निभाने को है  आतुर  
रहना चाहती है साथ .............सुलझा के तमाम बदशक्ल गांठे
और इसी पर है उसका सारा ध्यान  
क्योकि बंदे से करती है वो अब भी खूब प्यार | 

एक दिन स्त्री चल देती है ..............दबे पाँव 
ये उसके प्रस्थान का सबसे अहम् पहलू है
और जाहिर सी बात है कि 
आदमी उसे समझ ही नहीं पाते 
बोलती ,कुछ शिकायत करती और झगडती स्त्री 
अचानक् चुप्पी के द्वार  में प्रवेश कर जाती है  
और जब अंतिम तौर पर टूट जाती है 
रिश्तो पर से उसकी आखिरी आस 
उसका प्यार हो जाता है लहूलुहान 
तब मन ही मन वह समेटने लगती है 
अपने साजो -सामान ,सूटकेस
अपने दिमाग में ही खरीदती है
अपने लिए सफ़र का टिकिट  
हालांकि उसका शरीर उपरी तौर पर करता रहता है 
सब कुछ यथावत 
और इस तरह स्त्री निकल जाती है रिश्तो के दरवाजे से बाहर 
सचमुच ऐसे प्रस्थान कर जाने वाली स्त्री के
पदचाप नहीं सुनाई देते 
आहट तक नहीं होती उसकी कोई 
वो अपना बोरिया बिस्तर इस तरह समेटती है कि
किसी को कानो कान खबर नहीं होती 
वो दरवाजे को भिडकाए बिना ही निकल जाती है
जब तलक सांझ को आदमी के घर लौटने पर स्त्री 
खोलने को तत्पर रहती है दरवाजा 
समझता नहीं आदमी उस स्त्री का वजूद 
फिर रसोई में जो स्त्री बनाती है खाना  
बगल में बैठ कर  जो स्त्री देखती है टी .वी
और अपनी रूह को परे धर कर 
कर लेती है जैसे -तैसे प्रेम 
वह लगती है वैसी ही स्त्री हो  ,पर 
अब वो पहले वाली स्त्री नही है
उसके इस झगडे को समझ पाना मुमकिन नहीं 
क्योकि इसी तरह स्त्री चली जाती है .......दबे पाँव 
बस इतनी -सी है उस स्त्री की कहानी |  




     























शुक्रवार, 14 जून 2013

हौसलेमंद पिता

पिता ,इस शख्स की बात बहुत अरसे तक तो समाज में की ही नहीं गयी । फिर जब जिक्र आया भी ,तो कुछ इस तरह कि आज पिता ,माँ की तरह काम कर रहे है और माँ पिता का रूप धरे हुए है । ऐसा कहने -सुनने या एकाध मिसाल देने में भला  ये मालूम हो सकता है ,लेकिन जो कोई सायास ही दुसरे की भूमिका निभा सकता ,तो कुदरत ने हमे इसी तरह गढ़ा होता । कुदरत गलतियाँ नहीं करती । बनावट में सबके दिल एक से लगेंगे ,लेकिन साम्य होता कहाँ है ? मिलजुलकर ही संतुलन बन सकता है ,भाव -भरी माँ और हौसलेमंद पिता से चलती है दुनिया ।
               पिता वो है ,जिनके असीमित स्नेह ,संरक्षण और मार्गदर्शन के तले संतान का जीवन खिलता और खिलखिलाता है  । बचपन की कोई भी जरुरत इतनी तीव्र नहीं होती ,जितनी पिता के संरक्षण की जरुरत । पिता वो दमदार छवि होती है ,जिसके साए में पूर्ण सुरक्षा और भरोसे का अहसास होता है । बच्चे के मन में पिता का डर होता है ,जिससे वे कुछ भी गलत करने से पहले सोचने पर मजबूर हो जाते है ,साथ ही उसे विश्वास भी होता है कि मेरे पिता समय आने पर मेरी ढाल के रूप में मौजूद रहेंगे । बच्चो को पता होता है कि जाने -अनजाने में भूल हो जाने पर भी पिता उसके साथ खड़े रहेंगे ।
               जिन्दगी में जब कभी थोड़ी- सी भी दिक्कत पेश आए तो घर पर फोन लगा लो । माँ चाहे कितनी ही हौसलेवाली क्यों ना हो ,उसकी आवाज सुनते ही दुःख आँसू बनकर बह निकलेगा और जो पापा ने फोन उठाया तो ,मुसीबत से लडने का हौसला उसी दम आ जायेगा ,ये भूमिकाओं में बुनियादी फर्क है । माँ बात कहने की गुंजाइश देती है ,तो वही दूसरी और पिता कहने नहीं ,करने का हौसला देते है । चाहे हम कितने ही आधुनिक हो जाए ,पर ये सत्य है कि कुछ संस्कार पिता से ही आते है ,और जो पिता इस और ध्यान न दे तो बच्चे अपना रास्ता भटक जाते है ।पिता पतंग की डोर के सामान होना  चाहिए। पतंग उड़ती रहे ,इसके लिये आवश्यक है कि कभी डोर तनी हुई हो और कभी ढीली । हरदम ढील भी गड़बड़ है और लगातार तनाव भी ।
            बच्चो का रवैया कुछ भी हो ,पिता अपने कर्त्तव्य से मुंह नहीं मोड़ सकते । उसे संस्कार ,सहयोग और सम्बल देने का सबसे बड़ा ज़िम्मा पिता का ही है । बच्चे को अनुशासित करने का सबसे अधिक दायित्व भी उनका ही है ,साथ ही आर्थिक और भावनात्मक जुडाव भी जरूरी है ,ना सिर्फ इतना ही ,अपितु अच्छा माहौल भी हो और साथ ही मिले पिता को आदर व सम्मान।
        "पिता बच्चे के लिए जो सबसे महत्वपूर्ण काम कर सकते है ,जिससे उनका रिश्ता एक आदर्श बन सके और बच्चा खुश रह सके ,वो है उसकी माँ से प्रेम करना ,उसकी माँ का सम्मान करना और हमेशा उसे खुश रखना। ये वो अहम कड़ी है जो बच्चो को अपने पिता से जोड़े रखती है ''।
         एक तरफ माँ सिखाती है कि जिन्दगी में हार भी जाना  पड सकता है ,सो दिल छोटा न करना ,वही पिता बताते है कि हिम्मत इस तरह बांधे रखो कि मुश्किलें खुद ही हारती रहे । समझौता करना नहीं सिखाते पिता । ये दो नजरिये नहीं ,दो सबक है ,दो फार्मूले है ,जिनका जिन्दगी के सवालों पर उचित इस्तेमाल किया ,तो हल हमेशा जीत के रूप में सामने आऐगा । पिता न हारते है ,और न हारने की बात करते है । वे मुकाबला करना सिखाते है । जो सीख लिया ,तो नतीजों की अहमियत उतनी बडी नहीं लगेगी ।

.




बुधवार, 8 मई 2013

आसमान -सी माँ

एक स्त्री है जो माँ बनने वाली है ।
 अपने अजन्मे बच्चे के बारे में क्या सोचती होगी ? पूरे नौ महीने तक । अपने गर्भ पर हाथ रखकर क्या दुआए देती होगी ,क्या प्राथनाए करती  होगी ? पर सच है । जो अभी केवल उससे जुड़ा है ,उस अजन्मे से बाते करती है वो स्त्री । इसी तरह बीतते है नौ माह । धीरे -धीरे माँ बनते हुए । अकेले में मुस्कुराते ,कल्पनाओ की सलाइयों पर मन की डोरियो से सपने बुनते ,छोटे -छोटे हाथो को थामने की ललक लिये ।
                           उसे नहीं आता ख्याल बेटा -बेटी का । ये हिसाब -किताब तो वो रखते है ,जो केवल शिशु के जन्म के समय आते है । उस वक़्त शिशु को अपने रिश्ते समझाने । माँ को बताने कि बेटी की माँ बनने और बेटे की माँ बनने में क्या फर्क होता है । माँ हँसती है ,मन ही मन । माँ के लिए क्या अंतर होगा कि वो किसकी माँ बनी ? उसकी दुनिया तो बच्चे के होते ही बदल गई और पूरी भी हो गई । जब वो अपने अजन्मे से बाते करती थी ,तो उसके संवाद को सुनने में किसी और की रूचि नहीं होती थी ।
                            आज जब वो अपने बच्चे के पास लेटी ,उसकी नन्ही उंगलियों को अपने हाथ में लेकर बतिया रही है ,उसकी हर पल चिंता करती है ,उसका हर पल ख्याल रखती है ,तो कोई सुने या ना सुने ,समझे या ना समझे ,इसकी परवाह माँ को नहीं है । एक माँ अपने बच्चे को किस तरह टूट के  प्यार करती है ,ये सिर्फ एक माँ ही समझ सकती है और कोई नहीं । परवरिश ,सामाजिक ज़िम्मेदारियाँ ,भविष्य के सपने ,कल का नागरिक जैसे बड़े -बड़े शब्द माँ -बच्चे के इस बिछौने के पास भी नहीं फटकती ।
                              वो तो अपने बच्चे के हर एक लम्हें को जीना चाहती है ,उसकी हर पहली बात महसूस करना चाहती है ,चाहे वो उसके मुंह से निकला पहला शब्द हो ,चाहे पहली बार उसका चलना ,पहली बार रोना ,पहली बार  हँसना या फिर उसका पहली बार उसे ''मम्मा ''बोलना ही क्यों ना हो । वो उसके स्कूल के पहले दिन का इंतजार करती है ,कल्पना में उसके साथ उसे छोड़ने जाती है ,फिर उसके घर आने का इंतजार करती है ,और भी ना जाने क्या-क्या ....................।
                             जिन लम्हों का उसने इतने महीनो इंतजार किया ,वो आज भीगे मोगरे की कलियों की तरह महक रहे है । दुनिया ना जाने क्या -क्या नाम दिया करती है माँ को ,किन -किन उपमाओं से नवाजती है । शिशु को दुलारती माँ को देखकर ,तो बड़े से आसमान के नीचे चिड़िया के छोटे -से बच्चे की पहली उड़ान का ही ख्याल आता है । नींद में भी जब शिशु उंगली पहचान कर थाम  लेता है ,तो इस आसमान की आँखे छलक जाती है । हर नन्ही परवाज़ पर दुआओं के आसमान का दामन कायम रहे ,यही कामना है ।
.                                सीवन टूटी जब कपडों की ,
                                 या उधड़ी जब तुरपाई
                                 कभी तवे पर हाथ जला ,
                                 तब मम्मी तेरी  याद आई ।

                                 छोटी -छोटी लोई से मैं ,
                                 सूरज -चाँद बनाती थी
                                 जली -कटी उस रोटी को तू  ,
                                 बड़े चाव से खाती थी ।

                                 मम्मी तेरी बेटी के भी ,
                                 पकने लगे रेशमी बाल
                                 बड़े प्यार से तेल लगाकर ,
                                 तूने  की थी साज -संभाल ।

                                 तूने  तो माँ चौबीस बरस के ,
                                  बाद मुझे भेजा ससुराल
                                  नन्ही बच्ची देस पराया ,
                                  किसे सुनाऊ दिल का हाल ।

                                 तेरी ममता की गर्मी ,
                                 अब भी हर रात रुलाती है
                                 बेटी की जब हूक उठे तो ,
                                 याद तुम्हारी आती है ।

                                 जन्म मेरा फिर तेरी कोख से ,
                                 तुझसा ही जीवन पाऊ
                                 बेटी हुई इस बार मुझे माँ ,
                                 फिर खुद को उसमे  दोहराऊ ।

                                  बेटी हुई इस बार मुझे माँ ,
                                 फिर खुद को उसमे  दोहराऊ ।
                                                                                                                                                                                                    

शनिवार, 4 मई 2013

एक अनोखा बंधन

 मुझे  याद है जब मैं 2004 में मंदसौर गई थी ,एक  छोटा बच्चा जो  कि करीबन ढाई साल का होगा ।  घर के बाहर बैठकर मेरा इंतजार कर रहा था ।  तब वो वाकर में चलता था । वो मुझसे चिडता था ,जब मैं अकेले में होती,तो मुझे मारता ,मेरे पैरो पर वाकर के पहिये चड़ा देता था ,कहता था आप तो सोनू भैया की जीजी हो ना ,मेरे घर क्यों आई हो ,कब जाओगी ??????और मैं कभी हँसकर ,तो कभी परेशान होकर उसकी बातों को नजरअंदाज कर देती ।
               तब न तो वो जानता था और ना मैं कि वो जो आज मुझसे इतना चिडता है ,कभी मुझसे इतना प्यार करेगा । धीरे -धीरे ना जाने कब ये रिश्ता मजबूत होता गया ,पता ही नहीं चला । उसका  मेरे रोज कॉलेज से आने का इंतजार करना  ''जीजी कब आएगी ?''और घर के सभी सदस्य के कहने पर की वो चली गई है बाग ,उसका रो पड़ना , आज भी याद है । मेरे दिख पड़ने पर उसका खुश हो जाना और मुझसे कहना ''मोटी तू आ गई ,मेरे लिए क्या लाई है ''।
                फिर उसका स्कूल एडमिशन । मेरा उसको स्कूल छोड़ने जाना ,कॉलेज से लौटते वक़्त उसे घर  लाना याद है । शाम को सब साथ बैठकर टी .वी . देखते थे ,वो सिर्फ मेरी गौद में बैठकर टी .वी .देखता था ,जब मेरे पैर दर्द करते थे तो मैं उसे थोड़ी देर भुआ की गौद में बैठने को कहती तो वो बुरा मान जाता और रूठकर जमीन पर बैठ जाता । किसी के मनाने पर नहीं मानता ,आखिर मुझे ही हारकर उसे अपने पास बुलाना पड़ता था ,और वो एक आवाज में मेरे पास आ जाता और कहता ''मोटी ज्यादा इतराती है '' ऐसा ही रोज होता । ऐसे कई छोटे -छोटे झगडे होते हमारे बीच ।
            याद है वो मुझसे पूछता ''मोटी तुझे भूख लग रही है क्या ''। मेरा जवाब देना ''नहीं ,क्यों ,तुझे लग रही हो तो खा ले ''। इस पर उसका कहना कि ''जब तुझे भूख लगेगी ना तब मुझे भी लगेगी ''। याद है उसका मेरे साथ ही खाना खाना ,मेरे हाथो से पेस्ट करना ,मेरे ही हाथो से नहाने की, मेरे पास सोने की जिद करना ,उसके सो जाने पर भुआ का उसे ले जाना ,फिर सुबह उठकर उसका रोना ''मैं तो मोटी के पास सोया था ,यहाँ कैसे आ गया ''। आखिर उसकी जिद के आगे भुआ को झुकना ही पड़ा ,और फाइनली वो मेरे ही पास सोने लगा । इतना ही नहीं मेरे बाग ( मेरा गाँव )जाने पर वो मेरे  साथ चलने की जिद करता था ,और आखिर मुझे सुबह ५ बजे जाना पड़ता ,उसे सोता हुआ छोड़कर । आखिर ऐसा कब तक चलता ,अब वो समझ चुका था । अब आखिर -कार वो दिन आ ही गया , जब वो मेरे साथ जा रहा था ,बाग पहुचने पर सब आश्चर्य चकित रह गये ,उसे मेरे साथ देखकर ।
               बड़े अचंभे की बात है ,जब मैं  ऊपर पढाई करती थी ,वो चुपचाप मेरे पास बैठा रहता। वो उम्र जिसमे बच्चे खेलना पसंद करते है ,वो ऐसे चुपचाप ...........। मैं कई बार कहती'' बोर तो नहीं हो रहा है ,जा खेल'' । वो जवाब में कहता ''नहीं तू पढाई ख़तम कर ले ,फिर खेलेंगे अंताक्षरी ''। मैं उसे एक रफ़ -कोपी और पेन दे देती और वो भी कुछ ड्राइंग करता उस पर । फिर मेरी पढाई ख़त्म कर हम खेलते थे ।
              याद करने को तो बहुत कुछ है ,जिसको बया करना संभव नहीं,और भुला पाना भी ।