गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

दुर्गति

शादी के बाद दुर्गति तो
लड़की की होती है लेकिन
घड़ियाली आंसू
बहाता लड़का है !
आज़ादी छिनी
लड़की की लेकिन
ग़ुलामी का ढिंढोरा
पीटता लड़का है !
असली समझौता तो
लड़की करती है
लेकिन खुद को क़ैदी
समझता लड़का है !
लड़की का घर छूटा,
माँ-बाप, भाई-बहन-
सहेलियां छूटीं !
उसकी आज़ादी छिनी-
घूमने की, पहनने की,
नौकरी करने की,
हँसने-बोलने की,
कहीं आने-जाने की !
उसे ग़ुलामी मिली-
खाना बनाने की,
ससुराल में सबकी सेवा की,
डांट-फटकार सहने की
(कभी कभी पिटने की भी),
घर भर के कपड़े धुलने की !
...........और लड़के को
उसको तो घर बैठे
एक नौकरानी मिली,
साथ में दहेज़ भी,
वंश बढ़ाने वाली
मशीन और रोबोट
की तरह बिना तर्क किये
हर सही-ग़लत हुकुम की
तामील करने वाली
एक निजी संपत्ति भी !
शादी के बाद लड़की की
तुलना में लड़कों को
न के बराबर कॉमप्रमाइज़
करना पड़ता है
लेकिन दुनिया भर में
ढिंढोरा लड़के ही
पीटते हैं !
इसलिए
शादी के बाद
अपनी आज़ादी छिनने
का रोना रोने वाले !
सारा दोष
वाइफ़ पे थोपने वाले
संस्कारी मर्दो !
एक बार
दूसरे तरह से भी
सोचके देखो !
फ़र्ज़ करो कि
शादी के बाद तुम्हें
अपना घर,
माँ-बाप,भाई बहन, गाँव,
मित्र सब छोड़ना पड़े;
जींस-टी शर्ट की जगह
साड़ी पहननी पड़े,
घर में बंद रहना पड़े,
खाना बनाना पड़े,
बर्तन-कपड़े धुलने पड़ें,
डांट-फटकार सहना पड़े,
कहीं आने-जाने पे
पाबंदी लग जाए तो
क्या हाल होगा तुम्हारा ?
इसलिए आगे से
दोषारोपण करने से पहले
और
घड़ियाली आंसू
बहाने से पहले
सौ बार सोचना !
अपने पार्टनर को
इंसान समझिये,
मशीन नहीं !
साथी समझिये,
नौकरानी नहीं !
उसका हाथ बंटाइए,
फ़रमान मत सुनाइए !
उसकी आज़ादी
उसे दीजिये, क़ैद नहीं !
प्यार करिए,
दया मत दिखाइए !
अपना सब कुछ
छोड़ के आई है
इसलिए !
तुमसे अधिक आज़ादी,
हक़, बराबरी और सम्मान
डिज़र्व करती है लड़की
ये बात जिस दिन आपके
भेजे में घुस गयी, ज़िन्दगी बहुत
ख़ूबसूरत दिखने लगेगी!

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

चतुष्पदी

चुभन आँखों के रास्ते दिल में उतर जाती है,
बनके लहू फिर वो आँखों से बह जाती है,
दर्द सहकर सदा चुप रह जाने वालों से भी गलतियां हो जाती है,
कभी कभी दिल की बात होठों पर भी आ जाती है।

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

बहू

अक्सर लोगों को कहते सुनती हूँ "हमारी बहू बेटी जैसी है". क्या आपने कभी किसी को कहते सुना है कि "मम्मी बिल्कुल पापा जैसी है या पापा मम्मी जैसे हैं "? नहीं, क्योंकि पापा पापा होते हैं और मम्मी मम्मी. उन्हे किसी के जैसा होने की जरूरत नहीं है.  जब हम किसी के जैसा होना चाहते हैं तो अपने अस्तित्व पर ही प्रहार कर देते हैं. सेकंड क्लास सचिन तेंदुलकर बनने से बेहतर है कोई फ़र्स्ट क्लास स्वयं क्रिकेटर बने. बहू बेटी जैसी होनी चाहिए, यह वाक्य बहू की पहचान पर प्रश्न उठाता है. क्या बहू होने मे अपनी कोई खासियत नहीं है जो बेटी जैसा होने का प्रमाण चाहिए? बहू होना क्या इतना बुरा है? कोई यह भी क्यूँ कहता है "हम बहू को बेटी जैसा प्यार देंगे", इसका मतलब बहू जैसा प्यार या तो होता ही नहीं या फिर देने लायक नहीं होता. बहू बहू होती है और बेटी बेटी. इनकी तुलना करना बेबुनियाद है. यह तुलना करके आप संतरे से यह कह रहे हैं कि तू सेब की तरह गुणकारी नहीं हैं और सेब से ये कह रहे हैं कि तू रसदार नहीं है.  बेटी घर मे जन्म लेती है, उसके बचपन की किलकारियों से गूँजता है घर. बहू पराए घर से आती है, अपना बचपन कहीं पीछे छोड़ आती है, वो बेटी जैसी कैसे हो सकती है? और क्यों हो वो बेटी जैसी? बहू होकर ही जब वो बहुत कुछ है तो ऎसी अपेक्षा पर क्यूँ जवाबदेह रहे?  जब वो मुझसे कहते कि मैं बेटी जैसी हूँ मैंने कहा मैं बचपन से तो किसी और की बेटी थी अब अचानक स्टेटस कैसे बदलूँ? मुझे नहीं होना किसी के जैसा, मैं स्वयं मे ही सम्पूर्ण हूँ. अगर  हो सके  तो मेरे बुरे वक्त मे साथ खड़े रहना. मेरी स्वाभाविक कमजोरियों पर हँसना मत. मेरे मातृत्व पर सवाल मत खड़े करना. मुझे बेटी जैसा प्यार मत देना, पर मुझे बहू का सम्मान देना. मुझे बहू का प्यार देना. मैं बहू हूँ और बहू ही रहूँगी. बेटी तो मैं किसी की सालों पहले जन्मी थी, अब यह फिर से तो अगले जन्म मे ही पाएगा.