सोमवार, 26 सितंबर 2016

स्वतंत्रता की परिभाषा

“क्या है अपने भीतर.........
न तू जाने, न मैं जानूं..
मन कभी इस ओर तो कभी उस ओर..
दिल की जुबां न तू समझे, न मैं समझूं..
पता नहीं कौन से गुण-अवगुण हैं भीतर..
गुण तो कोई न जाने, पर अवगुण सब जानें..
अपनों के होने का पता सिर्फ़ वफ़ादारी और विश्वास से चले..
पर फ़िर दूसरों के शब्दों पर अपनों से ज्यादा एतबार क्यों..??
जब वहीं इन्सान सामने हो..तो कुछ अच्छा नहीं..
पर जब दूर हो जाये तो उसी की याद क्यों..??
जब अपने की ही हर बात में कमी दिखे..
तो दूसरा अच्छा कैसे लगे..??
पर क्यों हरदम दूसरे की ही जिन्दगी अच्छी लगे.??
अपने हमेशा रहते हैं साथ में..
पर फ़िर उसी के लिये शर्तों की जिन्दगी निर्धारित करें.. क्यों..??
सबके हिसाब से चलते-२ थक गयी जिन्दगी..
अब तो अपने दिल की बात को सुनें..
सुनी सबकी हर पल और अभी तक..
अब तो अपने से कोई पहला फ़ैसला कर लें...
कभी अपनों के लिये तो कभी पैसों के लिये जी ये जिन्दगी..
अब कम से कम एक दिन तो मन के मुताबिक जी लें..
.................................................................

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें