अपने अजन्मे बच्चे के बारे में क्या सोचती होगी ? पूरे नौ महीने तक । अपने गर्भ पर हाथ रखकर क्या दुआए देती होगी ,क्या प्राथनाए करती होगी ? पर सच है । जो अभी केवल उससे जुड़ा है ,उस अजन्मे से बाते करती है वो स्त्री । इसी तरह बीतते है नौ माह । धीरे -धीरे माँ बनते हुए । अकेले में मुस्कुराते ,कल्पनाओ की सलाइयों पर मन की डोरियो से सपने बुनते ,छोटे -छोटे हाथो को थामने की ललक लिये ।
उसे नहीं आता ख्याल बेटा -बेटी का । ये हिसाब -किताब तो वो रखते है ,जो केवल शिशु के जन्म के समय आते है । उस वक़्त शिशु को अपने रिश्ते समझाने । माँ को बताने कि बेटी की माँ बनने और बेटे की माँ बनने में क्या फर्क होता है । माँ हँसती है ,मन ही मन । माँ के लिए क्या अंतर होगा कि वो किसकी माँ बनी ? उसकी दुनिया तो बच्चे के होते ही बदल गई और पूरी भी हो गई । जब वो अपने अजन्मे से बाते करती थी ,तो उसके संवाद को सुनने में किसी और की रूचि नहीं होती थी ।
आज जब वो अपने बच्चे के पास लेटी ,उसकी नन्ही उंगलियों को अपने हाथ में लेकर बतिया रही है ,उसकी हर पल चिंता करती है ,उसका हर पल ख्याल रखती है ,तो कोई सुने या ना सुने ,समझे या ना समझे ,इसकी परवाह माँ को नहीं है । एक माँ अपने बच्चे को किस तरह टूट के प्यार करती है ,ये सिर्फ एक माँ ही समझ सकती है और कोई नहीं । परवरिश ,सामाजिक ज़िम्मेदारियाँ ,भविष्य के सपने ,कल का नागरिक जैसे बड़े -बड़े शब्द माँ -बच्चे के इस बिछौने के पास भी नहीं फटकती ।
वो तो अपने बच्चे के हर एक लम्हें को जीना चाहती है ,उसकी हर पहली बात महसूस करना चाहती है ,चाहे वो उसके मुंह से निकला पहला शब्द हो ,चाहे पहली बार उसका चलना ,पहली बार रोना ,पहली बार हँसना या फिर उसका पहली बार उसे ''मम्मा ''बोलना ही क्यों ना हो । वो उसके स्कूल के पहले दिन का इंतजार करती है ,कल्पना में उसके साथ उसे छोड़ने जाती है ,फिर उसके घर आने का इंतजार करती है ,और भी ना जाने क्या-क्या ....................।
जिन लम्हों का उसने इतने महीनो इंतजार किया ,वो आज भीगे मोगरे की कलियों की तरह महक रहे है । दुनिया ना जाने क्या -क्या नाम दिया करती है माँ को ,किन -किन उपमाओं से नवाजती है । शिशु को दुलारती माँ को देखकर ,तो बड़े से आसमान के नीचे चिड़िया के छोटे -से बच्चे की पहली उड़ान का ही ख्याल आता है । नींद में भी जब शिशु उंगली पहचान कर थाम लेता है ,तो इस आसमान की आँखे छलक जाती है । हर नन्ही परवाज़ पर दुआओं के आसमान का दामन कायम रहे ,यही कामना है ।
. सीवन टूटी जब कपडों की ,
या उधड़ी जब तुरपाईकभी तवे पर हाथ जला ,
तब मम्मी तेरी याद आई ।
छोटी -छोटी लोई से मैं ,
सूरज -चाँद बनाती थी
जली -कटी उस रोटी को तू ,
बड़े चाव से खाती थी ।
मम्मी तेरी बेटी के भी ,
पकने लगे रेशमी बाल
बड़े प्यार से तेल लगाकर ,
तूने की थी साज -संभाल ।
तूने तो माँ चौबीस बरस के ,
बाद मुझे भेजा ससुराल
नन्ही बच्ची देस पराया ,
किसे सुनाऊ दिल का हाल ।
तेरी ममता की गर्मी ,
अब भी हर रात रुलाती है
बेटी की जब हूक उठे तो ,
याद तुम्हारी आती है ।
जन्म मेरा फिर तेरी कोख से ,
तुझसा ही जीवन पाऊ
बेटी हुई इस बार मुझे माँ ,
फिर खुद को उसमे दोहराऊ ।
बेटी हुई इस बार मुझे माँ ,
फिर खुद को उसमे दोहराऊ ।