हिजड़ा
आईने पर नज़र पड़ी तो मैं अचकचा गया।विभिन्न मुखमुद्राओं में सुबह वाला हिजड़ा हर दुकान के आगे नाच गा रहा था। लोग उसके नाचने पर पैसे फेंक कर हँस रहे थे।और वो लोगों से वेपरवाह ताली बजाकर नाच रहा था।एक घृणा की लहर मेरे चेहरे पर छा गई और मैं पीछे हट गया। "साला हिजड़ा !थू ।"
मैं पीछे मुड़ा तो अब आइने में वो पगली घूमने लगी। फटे चीथड़ों में लोगों की भूखी नजरों से वेपरवाह यहाँ वहाँ घूमती।
"उफ पूरे बाजार का क्या हाल बना दिया है ?कहीं हिजड़ा ,कहीं पगली।कुछ कपड़े उठाकर मैंने उसके तन पर डाल दिये और दुकान के बाहर की जगह में एक फटी चादर डाल दी उसके सोने को।"
अब मैं आइने से नजर हटाकर आँखें बंद कर सोने की कोशिश करने लगा कि नजर फिर आईने पर चली गई। वो गुंडे टाइप लड़के मेरे सामने चले आये उस निरीह पगली को खींचते हुए।मुझसे रूका नहीं गया।
"अरे कहाँ ले जा रहे हो इसे ?इसे बख्श दो पागल है ये।"
"देखो चाचा! सबने दुकान बंद कर दी।बेहतर है तुम भी करो और चलते बनो।"
"नहीं ! मैं तुम्हें ये पाप नहीं करने दूंगा।"
"देखो तुम्हें चाचा कहते हैं हम।दिन रात का आना जाना है बाजार में।नहीं चाहते खून खराबा हो।"उनमें से एक ने चाकू लहराया।
"नहीं बेटा!मेरे बच्चे बहुत छोटे हैं अभी।लेकिन बेटा पाप है ये ।"मरीमरी सी आवाज निकली
"फिर चुपचाप दुकान में चले जाओ।हमें जो करना है करने दो।पाप-पुण्य हम देख लेंगे।लेकिन हमारे हाथ बहक गये तो तुम कल का सूरज नहीं देख पाओगे।"
मैं डर से दुकान का शटर गिरा अंदर बैठ गया।दिल को समझाया क्या लगती है ये पगली मेरी।ऐसी कितनी ही पगली इन लोगों की भेंट चढ़ती होंगी।
और पगली की कातर चीखों से वो सुनसान रात गूँज उठी।
एक झुरझुरी सी आ गई। ठंड में माथे पर पसीने की बूँदें चुहचुहाई। चीखों की गूँज बढ़ती जा रही थी।गला सूख रहा था। मैंने तेजी से उठाकर पानी पिया, चीखें बढ़ती ही जा रही थीं। मैंने पानी का गिलास फेंक कर आईने पर दे मारा।आईना टुकड़े-टुकड़े हो गया।मैं चैन की साँस ले आँखें बंद कर सोने की कोशिश करने लगा कि नजर फिर आईने पर चली गई।अब हर टुकड़े में मेरा अक्स विभिन्न मुख मुद्राओं के साथ ताली बजा बजाकर नाचने लगा।मैंने घृणा से मुँह फेर लिया और जोर से चिल्लाया "साला हिजड़ा!थू।"
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