भगवान् ने नर व नारी इस उद्देश्य के चलते थोड़ा थोड़ा अधूरा बनाया है ,ताकि वे आलिंगन करे और इस अपूर्णता को संपूर्णता प्रदान करे।हालांकि ,शताब्दियों से संस्काराग्रस्त होने के चलते पति और पत्नी शब्दो को एक संकुचित अर्थो में बांध दिया है,जिससे इस संबंध की व्यापकता सिमटकर रह गई है ।फिर कभी दोनों माँ की भूमिका निभाए तो कभी पिता की,कभी शरारती बच्चे की,तो कभी समझदार सलाहकार की,कभी शिक्षक की,कभी दर्पण की....तो कभी पति और पत्नी की भी |इस संबंध की परिभाषा को विस्तार दे,खुला रखे,मुक्त रखे।
वैवाहिक संबंध की गरिमा तभी होती है,जब हम अपने जीवनसाथी से समूचे व्यक्तित्व से जुड़े हो,न कि केवल शरीर से।एक दूसरे के सोचने के तरीकों को,व्यतिगत मूल्यों ,दृष्टिकोणों और धारणाओं को समझना जरूरी होता है।एक दूसरे की भावनाओं के प्रति संवेदनशील रहना,परस्पर भावनात्मक अनुकूलता विकसित करना जरुरी है।एक दूसरे के लिए समय निकालना जरुरी है।एक दूसरे के समूचेपन का सम्मान करना,न कि केवल बहरी स्वरूप से।
मानती हूं कि जो दस वर्षों में करने योग्य हो उसे एक ही वर्ष में कर डालने की कोशिश नही करनी चाहिए।और जो एक वर्ष में किया जाना हो ,उसे एक महीने में ही करने की कोशिश नही करनी चाहिए।सब कुछ इतना अतिरेक में नही करना चाहिए कि सम्बन्ध में फिर करने जैसा कुछ रह ही न जाए,परन्तु एक ठन्डे पड़े हुए सम्बन्ध में केवल सह-अस्तित्व में भी नही जीना चाहिए।जो एक वृक्ष बन सकता हो,उसे एक पौधे के रूप में ही मरने नही देना चाहिए।अपितु उस पौधे को प्यार ,विश्वास,और समर्पण से सींच कर एक वृक्ष बनने दे,भलेही धीरे चलो,पर चलो अवश्य और दूर तक चलो।
जीवन में और अच्छे सम्बन्ध में भी,अतीत एक अप्रासंगिक चीज होती है।वर्तमान ही निर्माण शिलाएं बनाता है,भविष्य भी महत्वपूर्ण है,क्योकि हम दोनों को साथ साथ उसी में जाना है।रोज की छोटी छोटी बातों को एकांत में बैठकर चर्चा कर लेने से परस्पर प्रेम को बढ़ाया जा सकता है।एक दूसरे की अभिवृद्धि के लिए अपनी अपनी भूमिका निभाने के किसी ऐसे तरीके को अपनाना चाहिए जो उद्देश्यपूर्ण तो हो,किन्तु हस्तक्षेप करने वाला न हो।
पूरी दुनिया में यह धारणा प्रचलित है कि विवाह का अर्थ है दो शरीर, एक आत्मा। यानी विवाह के बाद जीने के लिए एक ही जीवन रह जाता है,इसका परिणाम यह हुआ कि विवाह के नाम पर स्त्रियों को अपने पति के साए की तरह रहने को बाध्य किया जाने लगा।वे अनुचरी मात्र बन कर रह गई और एक खिन्न,अपने पर तरस खाने वाली और बलि वेदी पर चढ़ी एक ऐसा व्यक्तित्व बन कर रह गई,जो स्वयं को शोषित महसूस कर रहा है।परंतु सच तो यह है कि तुम्हारे और मेरे जीवन के "हमारा" जीवन बनने के बाद भी मेरे और तुम्हारे जीवन का अस्तित्व बना रहता है। विवाह यानी "हमारा"जीवन तो वह स्थान है जहाँ मेरा और तुम्हारा जीवन आकर मिलते है।विवाह में सुखी रहना तो इस बात पर निर्भर करता है कि दोनों "हमारे"वाले स्थान में किस प्रकार सम्बंधित रहते हैऔर बीते वक़्त के साथ वह स्थान किस प्रकार बढ़ता जाता है।फिर भी,पुरुष और स्त्री दोनों के जीवन का अपना अपना अस्तित्व तो रहता ही है।दरअसल,जब हम अपने अपने स्थान पर जाकर फिर"हमारे"स्थान में लौटकर आते है,तब ही वे दोनों अपने सर्वोत्तम स्वरुप में होते है।इससे यह सुनिश्चित होता हैकि आप एक दूसरे के स्थान का,एक दूसरे की व्यक्तिगत रूचि-अरुचि का और प्राथमिकताओं का सम्मान करते है और सबसे बड़ी बात यह है कि केवल इसी से यह सुनिश्चित होगा कि प्रेम के नाम पर आप एक दूसरे का दम तो नही घोंट रहे है।
अपने सही अर्थों में,विवाह से पति और पत्नी दोनों के जीवन की गुणवत्ता में बढ़ोत्तरी होनी चाहिए।विवाह,दोनों के लिए संभावनाओं का विस्तार करते हुए,जीवन की एक सीधी प्रवाहित धारा हो सकता है और होना भी चाहिए।
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