पिता ,इस शख्स की बात बहुत अरसे तक तो समाज में की ही नहीं गयी । फिर जब जिक्र आया भी ,तो कुछ इस तरह कि आज पिता ,माँ की तरह काम कर रहे है और माँ पिता का रूप धरे हुए है । ऐसा कहने -सुनने या एकाध मिसाल देने में भला ये मालूम हो सकता है ,लेकिन जो कोई सायास ही दुसरे की भूमिका निभा सकता ,तो कुदरत ने हमे इसी तरह गढ़ा होता । कुदरत गलतियाँ नहीं करती । बनावट में सबके दिल एक से लगेंगे ,लेकिन साम्य होता कहाँ है ? मिलजुलकर ही संतुलन बन सकता है ,भाव -भरी माँ और हौसलेमंद पिता से चलती है दुनिया ।
पिता वो है ,जिनके असीमित स्नेह ,संरक्षण और मार्गदर्शन के तले संतान का जीवन खिलता और खिलखिलाता है । बचपन की कोई भी जरुरत इतनी तीव्र नहीं होती ,जितनी पिता के संरक्षण की जरुरत । पिता वो दमदार छवि होती है ,जिसके साए में पूर्ण सुरक्षा और भरोसे का अहसास होता है । बच्चे के मन में पिता का डर होता है ,जिससे वे कुछ भी गलत करने से पहले सोचने पर मजबूर हो जाते है ,साथ ही उसे विश्वास भी होता है कि मेरे पिता समय आने पर मेरी ढाल के रूप में मौजूद रहेंगे । बच्चो को पता होता है कि जाने -अनजाने में भूल हो जाने पर भी पिता उसके साथ खड़े रहेंगे ।
जिन्दगी में जब कभी थोड़ी- सी भी दिक्कत पेश आए तो घर पर फोन लगा लो । माँ चाहे कितनी ही हौसलेवाली क्यों ना हो ,उसकी आवाज सुनते ही दुःख आँसू बनकर बह निकलेगा और जो पापा ने फोन उठाया तो ,मुसीबत से लडने का हौसला उसी दम आ जायेगा ,ये भूमिकाओं में बुनियादी फर्क है । माँ बात कहने की गुंजाइश देती है ,तो वही दूसरी और पिता कहने नहीं ,करने का हौसला देते है । चाहे हम कितने ही आधुनिक हो जाए ,पर ये सत्य है कि कुछ संस्कार पिता से ही आते है ,और जो पिता इस और ध्यान न दे तो बच्चे अपना रास्ता भटक जाते है ।पिता पतंग की डोर के सामान होना चाहिए। पतंग उड़ती रहे ,इसके लिये आवश्यक है कि कभी डोर तनी हुई हो और कभी ढीली । हरदम ढील भी गड़बड़ है और लगातार तनाव भी ।
बच्चो का रवैया कुछ भी हो ,पिता अपने कर्त्तव्य से मुंह नहीं मोड़ सकते । उसे संस्कार ,सहयोग और सम्बल देने का सबसे बड़ा ज़िम्मा पिता का ही है । बच्चे को अनुशासित करने का सबसे अधिक दायित्व भी उनका ही है ,साथ ही आर्थिक और भावनात्मक जुडाव भी जरूरी है ,ना सिर्फ इतना ही ,अपितु अच्छा माहौल भी हो और साथ ही मिले पिता को आदर व सम्मान।
"पिता बच्चे के लिए जो सबसे महत्वपूर्ण काम कर सकते है ,जिससे उनका रिश्ता एक आदर्श बन सके और बच्चा खुश रह सके ,वो है उसकी माँ से प्रेम करना ,उसकी माँ का सम्मान करना और हमेशा उसे खुश रखना। ये वो अहम कड़ी है जो बच्चो को अपने पिता से जोड़े रखती है ''।
एक तरफ माँ सिखाती है कि जिन्दगी में हार भी जाना पड सकता है ,सो दिल छोटा न करना ,वही पिता बताते है कि हिम्मत इस तरह बांधे रखो कि मुश्किलें खुद ही हारती रहे । समझौता करना नहीं सिखाते पिता । ये दो नजरिये नहीं ,दो सबक है ,दो फार्मूले है ,जिनका जिन्दगी के सवालों पर उचित इस्तेमाल किया ,तो हल हमेशा जीत के रूप में सामने आऐगा । पिता न हारते है ,और न हारने की बात करते है । वे मुकाबला करना सिखाते है । जो सीख लिया ,तो नतीजों की अहमियत उतनी बडी नहीं लगेगी ।
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पिता वो है ,जिनके असीमित स्नेह ,संरक्षण और मार्गदर्शन के तले संतान का जीवन खिलता और खिलखिलाता है । बचपन की कोई भी जरुरत इतनी तीव्र नहीं होती ,जितनी पिता के संरक्षण की जरुरत । पिता वो दमदार छवि होती है ,जिसके साए में पूर्ण सुरक्षा और भरोसे का अहसास होता है । बच्चे के मन में पिता का डर होता है ,जिससे वे कुछ भी गलत करने से पहले सोचने पर मजबूर हो जाते है ,साथ ही उसे विश्वास भी होता है कि मेरे पिता समय आने पर मेरी ढाल के रूप में मौजूद रहेंगे । बच्चो को पता होता है कि जाने -अनजाने में भूल हो जाने पर भी पिता उसके साथ खड़े रहेंगे ।
जिन्दगी में जब कभी थोड़ी- सी भी दिक्कत पेश आए तो घर पर फोन लगा लो । माँ चाहे कितनी ही हौसलेवाली क्यों ना हो ,उसकी आवाज सुनते ही दुःख आँसू बनकर बह निकलेगा और जो पापा ने फोन उठाया तो ,मुसीबत से लडने का हौसला उसी दम आ जायेगा ,ये भूमिकाओं में बुनियादी फर्क है । माँ बात कहने की गुंजाइश देती है ,तो वही दूसरी और पिता कहने नहीं ,करने का हौसला देते है । चाहे हम कितने ही आधुनिक हो जाए ,पर ये सत्य है कि कुछ संस्कार पिता से ही आते है ,और जो पिता इस और ध्यान न दे तो बच्चे अपना रास्ता भटक जाते है ।पिता पतंग की डोर के सामान होना चाहिए। पतंग उड़ती रहे ,इसके लिये आवश्यक है कि कभी डोर तनी हुई हो और कभी ढीली । हरदम ढील भी गड़बड़ है और लगातार तनाव भी ।
बच्चो का रवैया कुछ भी हो ,पिता अपने कर्त्तव्य से मुंह नहीं मोड़ सकते । उसे संस्कार ,सहयोग और सम्बल देने का सबसे बड़ा ज़िम्मा पिता का ही है । बच्चे को अनुशासित करने का सबसे अधिक दायित्व भी उनका ही है ,साथ ही आर्थिक और भावनात्मक जुडाव भी जरूरी है ,ना सिर्फ इतना ही ,अपितु अच्छा माहौल भी हो और साथ ही मिले पिता को आदर व सम्मान।
"पिता बच्चे के लिए जो सबसे महत्वपूर्ण काम कर सकते है ,जिससे उनका रिश्ता एक आदर्श बन सके और बच्चा खुश रह सके ,वो है उसकी माँ से प्रेम करना ,उसकी माँ का सम्मान करना और हमेशा उसे खुश रखना। ये वो अहम कड़ी है जो बच्चो को अपने पिता से जोड़े रखती है ''।
एक तरफ माँ सिखाती है कि जिन्दगी में हार भी जाना पड सकता है ,सो दिल छोटा न करना ,वही पिता बताते है कि हिम्मत इस तरह बांधे रखो कि मुश्किलें खुद ही हारती रहे । समझौता करना नहीं सिखाते पिता । ये दो नजरिये नहीं ,दो सबक है ,दो फार्मूले है ,जिनका जिन्दगी के सवालों पर उचित इस्तेमाल किया ,तो हल हमेशा जीत के रूप में सामने आऐगा । पिता न हारते है ,और न हारने की बात करते है । वे मुकाबला करना सिखाते है । जो सीख लिया ,तो नतीजों की अहमियत उतनी बडी नहीं लगेगी ।
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