मुझे याद है जब मैं 2004 में मंदसौर गई थी ,एक छोटा बच्चा जो कि करीबन ढाई साल का होगा । घर के बाहर बैठकर मेरा इंतजार कर रहा था । तब वो वाकर में चलता था । वो मुझसे चिडता था ,जब मैं अकेले में होती,तो मुझे मारता ,मेरे पैरो पर वाकर के पहिये चड़ा देता था ,कहता था आप तो सोनू भैया की जीजी हो ना ,मेरे घर क्यों आई हो ,कब जाओगी ??????और मैं कभी हँसकर ,तो कभी परेशान होकर उसकी बातों को नजरअंदाज कर देती ।
तब न तो वो जानता था और ना मैं कि वो जो आज मुझसे इतना चिडता है ,कभी मुझसे इतना प्यार करेगा । धीरे -धीरे ना जाने कब ये रिश्ता मजबूत होता गया ,पता ही नहीं चला । उसका मेरे रोज कॉलेज से आने का इंतजार करना ''जीजी कब आएगी ?''और घर के सभी सदस्य के कहने पर की वो चली गई है बाग ,उसका रो पड़ना , आज भी याद है । मेरे दिख पड़ने पर उसका खुश हो जाना और मुझसे कहना ''मोटी तू आ गई ,मेरे लिए क्या लाई है ''।
फिर उसका स्कूल एडमिशन । मेरा उसको स्कूल छोड़ने जाना ,कॉलेज से लौटते वक़्त उसे घर लाना याद है । शाम को सब साथ बैठकर टी .वी . देखते थे ,वो सिर्फ मेरी गौद में बैठकर टी .वी .देखता था ,जब मेरे पैर दर्द करते थे तो मैं उसे थोड़ी देर भुआ की गौद में बैठने को कहती तो वो बुरा मान जाता और रूठकर जमीन पर बैठ जाता । किसी के मनाने पर नहीं मानता ,आखिर मुझे ही हारकर उसे अपने पास बुलाना पड़ता था ,और वो एक आवाज में मेरे पास आ जाता और कहता ''मोटी ज्यादा इतराती है '' ऐसा ही रोज होता । ऐसे कई छोटे -छोटे झगडे होते हमारे बीच ।
याद है वो मुझसे पूछता ''मोटी तुझे भूख लग रही है क्या ''। मेरा जवाब देना ''नहीं ,क्यों ,तुझे लग रही हो तो खा ले ''। इस पर उसका कहना कि ''जब तुझे भूख लगेगी ना तब मुझे भी लगेगी ''। याद है उसका मेरे साथ ही खाना खाना ,मेरे हाथो से पेस्ट करना ,मेरे ही हाथो से नहाने की, मेरे पास सोने की जिद करना ,उसके सो जाने पर भुआ का उसे ले जाना ,फिर सुबह उठकर उसका रोना ''मैं तो मोटी के पास सोया था ,यहाँ कैसे आ गया ''। आखिर उसकी जिद के आगे भुआ को झुकना ही पड़ा ,और फाइनली वो मेरे ही पास सोने लगा । इतना ही नहीं मेरे बाग ( मेरा गाँव )जाने पर वो मेरे साथ चलने की जिद करता था ,और आखिर मुझे सुबह ५ बजे जाना पड़ता ,उसे सोता हुआ छोड़कर । आखिर ऐसा कब तक चलता ,अब वो समझ चुका था । अब आखिर -कार वो दिन आ ही गया , जब वो मेरे साथ जा रहा था ,बाग पहुचने पर सब आश्चर्य चकित रह गये ,उसे मेरे साथ देखकर ।
बड़े अचंभे की बात है ,जब मैं ऊपर पढाई करती थी ,वो चुपचाप मेरे पास बैठा रहता। वो उम्र जिसमे बच्चे खेलना पसंद करते है ,वो ऐसे चुपचाप ...........। मैं कई बार कहती'' बोर तो नहीं हो रहा है ,जा खेल'' । वो जवाब में कहता ''नहीं तू पढाई ख़तम कर ले ,फिर खेलेंगे अंताक्षरी ''। मैं उसे एक रफ़ -कोपी और पेन दे देती और वो भी कुछ ड्राइंग करता उस पर । फिर मेरी पढाई ख़त्म कर हम खेलते थे ।
याद करने को तो बहुत कुछ है ,जिसको बया करना संभव नहीं,और भुला पाना भी ।
तब न तो वो जानता था और ना मैं कि वो जो आज मुझसे इतना चिडता है ,कभी मुझसे इतना प्यार करेगा । धीरे -धीरे ना जाने कब ये रिश्ता मजबूत होता गया ,पता ही नहीं चला । उसका मेरे रोज कॉलेज से आने का इंतजार करना ''जीजी कब आएगी ?''और घर के सभी सदस्य के कहने पर की वो चली गई है बाग ,उसका रो पड़ना , आज भी याद है । मेरे दिख पड़ने पर उसका खुश हो जाना और मुझसे कहना ''मोटी तू आ गई ,मेरे लिए क्या लाई है ''।
फिर उसका स्कूल एडमिशन । मेरा उसको स्कूल छोड़ने जाना ,कॉलेज से लौटते वक़्त उसे घर लाना याद है । शाम को सब साथ बैठकर टी .वी . देखते थे ,वो सिर्फ मेरी गौद में बैठकर टी .वी .देखता था ,जब मेरे पैर दर्द करते थे तो मैं उसे थोड़ी देर भुआ की गौद में बैठने को कहती तो वो बुरा मान जाता और रूठकर जमीन पर बैठ जाता । किसी के मनाने पर नहीं मानता ,आखिर मुझे ही हारकर उसे अपने पास बुलाना पड़ता था ,और वो एक आवाज में मेरे पास आ जाता और कहता ''मोटी ज्यादा इतराती है '' ऐसा ही रोज होता । ऐसे कई छोटे -छोटे झगडे होते हमारे बीच ।
याद है वो मुझसे पूछता ''मोटी तुझे भूख लग रही है क्या ''। मेरा जवाब देना ''नहीं ,क्यों ,तुझे लग रही हो तो खा ले ''। इस पर उसका कहना कि ''जब तुझे भूख लगेगी ना तब मुझे भी लगेगी ''। याद है उसका मेरे साथ ही खाना खाना ,मेरे हाथो से पेस्ट करना ,मेरे ही हाथो से नहाने की, मेरे पास सोने की जिद करना ,उसके सो जाने पर भुआ का उसे ले जाना ,फिर सुबह उठकर उसका रोना ''मैं तो मोटी के पास सोया था ,यहाँ कैसे आ गया ''। आखिर उसकी जिद के आगे भुआ को झुकना ही पड़ा ,और फाइनली वो मेरे ही पास सोने लगा । इतना ही नहीं मेरे बाग ( मेरा गाँव )जाने पर वो मेरे साथ चलने की जिद करता था ,और आखिर मुझे सुबह ५ बजे जाना पड़ता ,उसे सोता हुआ छोड़कर । आखिर ऐसा कब तक चलता ,अब वो समझ चुका था । अब आखिर -कार वो दिन आ ही गया , जब वो मेरे साथ जा रहा था ,बाग पहुचने पर सब आश्चर्य चकित रह गये ,उसे मेरे साथ देखकर ।
बड़े अचंभे की बात है ,जब मैं ऊपर पढाई करती थी ,वो चुपचाप मेरे पास बैठा रहता। वो उम्र जिसमे बच्चे खेलना पसंद करते है ,वो ऐसे चुपचाप ...........। मैं कई बार कहती'' बोर तो नहीं हो रहा है ,जा खेल'' । वो जवाब में कहता ''नहीं तू पढाई ख़तम कर ले ,फिर खेलेंगे अंताक्षरी ''। मैं उसे एक रफ़ -कोपी और पेन दे देती और वो भी कुछ ड्राइंग करता उस पर । फिर मेरी पढाई ख़त्म कर हम खेलते थे ।
याद करने को तो बहुत कुछ है ,जिसको बया करना संभव नहीं,और भुला पाना भी ।
very nice didi.....
जवाब देंहटाएंthanks
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